Sunday, December 6, 2020

लिपि देवनागरी, पुरातन नाम पाली
नहीं हूं मात्र सम्पर्क भाषा-
तुलसी मानस की हूं छंद, चौपाई
मीरा कबीर सूर की अमरवाणी.
मिटुंगी नहीं, टूटूंगी नहीं न मैं झुकूंगी,
अमर गाथा अखंड भारत के गाऊंगी,
नभ में लहराता रहे यूँ ही तिरंगा
मैं बनी रहूं भाषाओं की सूर सरि गंगा,
देवों की भाषा, संस्कृत मेरी जननी
हिंद के ललाट बिंदी, मैं हूँ हिन्दी
मैं हूँ राज भाषा हिंदी. संगीता (मीता)

महा संगीत`


पक्षी के हो कलरब
या मधुप का हो गुंजन,

कल कल नाद हो निर्झर का
या मंद मंद हो स्वर समीर का ,

पायल का हो झंकार या
थाप हो मृदंग या तबले की ,

अधर के कंपन से कंपित
हो मीठी मुरली की सुर ,
होते उत्पन्न टकराहट से
लगते मधुर या नाद निनाद .
इस से परे है एक नाद;
अनहद

होता ये मौन मे मुखर
सिर्फ शून्य,ओर शून्य
व्याप्त जड़ चेतन मे ,
,अन्तरिक्ष मे
ये गीत नहीं संगीत नहीं
ये है महा संगीत ...
शांति की.

संगीता-मीता

मांझी

उज्वल हो दिवा ,

या सुरमई साँझ

भरी दुपहरिया हो

या तारों भरी रात

खेते रहे मांझी नाव,

गाते रहे मल्हार

जीवन नैया चलती जाए


बांस के बांसुरी,

काठ के नाव

एक से उपजे सुर,

दूजा निर्वाह के उपाय.

सुर सजते जाए,

चलते जाए नाव.

पार उतारे जाने कितने मानुष.


थिरकन लहरों के,

धुन बांसुरी के

नश्वरता के पाठ

जगती को सिखाये

आज इस पार,

जाना है कल उस पार

अविरल बहते जाए समये के धार।

( संगीता-मीता)