Friday, July 2, 2021

गिरि सुता

मुझे बहने दो ...
ढलान से बहते, बहते
मुझे राह बनाने दो,
मैं क्षुद्र धारा गिरि की
मुझे मत बांधो.
बंधन में, मै प्रखर हो उठूंगी.
विनाश की तिलक सजा
मै प्रिय से मिलूँ
ये मेरी नियति ना हो,
मुझे बहने दो...
मुक्त हो मै ,तुम्हे अपनाऊंगी,
जीवन दायिनी हो मनुज
निश्चित तुम तक आऊंगी.
मुझे कण कण में घुलने दो
अवरोध मत धरो
मुझे बहने दो...
बादल बन तुम तक आउंगी
पावस बन तन मन भिगाऊंगी
खेत - खलिहान में
अमृत बूंद सी बरसुंगी
मुझे मत बंधो बंधन में
मुझे मत रोको
मुझे मिलने दो सागर से।

- संगीता(मीता )

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Sunday, December 6, 2020

लिपि देवनागरी, पुरातन नाम पाली
नहीं हूं मात्र सम्पर्क भाषा-
तुलसी मानस की हूं छंद, चौपाई
मीरा कबीर सूर की अमरवाणी.
मिटुंगी नहीं, टूटूंगी नहीं न मैं झुकूंगी,
अमर गाथा अखंड भारत के गाऊंगी,
नभ में लहराता रहे यूँ ही तिरंगा
मैं बनी रहूं भाषाओं की सूर सरि गंगा,
देवों की भाषा, संस्कृत मेरी जननी
हिंद के ललाट बिंदी, मैं हूँ हिन्दी
मैं हूँ राज भाषा हिंदी. संगीता (मीता)

महा संगीत`


पक्षी के हो कलरब
या मधुप का हो गुंजन,

कल कल नाद हो निर्झर का
या मंद मंद हो स्वर समीर का ,

पायल का हो झंकार या
थाप हो मृदंग या तबले की ,

अधर के कंपन से कंपित
हो मीठी मुरली की सुर ,
होते उत्पन्न टकराहट से
लगते मधुर या नाद निनाद .
इस से परे है एक नाद;
अनहद

होता ये मौन मे मुखर
सिर्फ शून्य,ओर शून्य
व्याप्त जड़ चेतन मे ,
,अन्तरिक्ष मे
ये गीत नहीं संगीत नहीं
ये है महा संगीत ...
शांति की.

संगीता-मीता

मांझी

उज्वल हो दिवा ,

या सुरमई साँझ

भरी दुपहरिया हो

या तारों भरी रात

खेते रहे मांझी नाव,

गाते रहे मल्हार

जीवन नैया चलती जाए


बांस के बांसुरी,

काठ के नाव

एक से उपजे सुर,

दूजा निर्वाह के उपाय.

सुर सजते जाए,

चलते जाए नाव.

पार उतारे जाने कितने मानुष.


थिरकन लहरों के,

धुन बांसुरी के

नश्वरता के पाठ

जगती को सिखाये

आज इस पार,

जाना है कल उस पार

अविरल बहते जाए समये के धार।

( संगीता-मीता)

Sunday, June 30, 2019

माटी

यहां माटी वहां माटी
कहाँ नहीं है माटी?
कहीं काली ,कहीं पीली 
बलुआ कहीं चिकनी
तरह,तरह की माटी,
कोई कहाँ मोल तेरे ?
बिखरी इधर उधर
अनमोल माटी..
माटी से फल, फसल
माटी से फूल ,फुलवारी
माटी से घर ,देह,देहरी
माटी से जीव ,जीवन ,क्यारी
करे माटी कुम्हार की चाकरी ।
माटी से सब जग निर्मित
न बना सका कोई माटी ,
सबकुछ माटी में मिट जाता
माटी ठगा माटी का आदमी ।
 *संगीता* 'मीता'

Sunday, September 4, 2016

तुम परम आनंद ,सत चिद आनंद 
मै आनंद के प्रथम छंद 
फिर ये विषाद कैसे है व्याप्त ?
तुम पवित्रता के महासिंधु तो 
मै पवित्रतम बिंदु ,फिर 
पातकता कैसे आविर्भूत ?
तुम सुमेरु निर्गुण ,सगुणों की
मै रेनू उसी सुमेरु की
फिर तुम में ,मुझमें भेद कैसा ?
तुम विद्या के सम्पूर्ण घट तो
मैं हूँ क्षुद्र वर्ण ,लिपि फिर
ये अविद्या मुझे कैसे करे लिप्त ?
तुमसे ही प्रस्फुटित ,पल्लवित
मिथ्या से मै क्यों सिंचित ?
विरोधाभास से मैं क्यों ग्रसित ?
स्वरुप अपने कर दो प्रकट
सम्हाल लो प्रभू अब तो मुझे
हो जाऊं तुम में समाहित sangeeta
स्नेह ,प्यार के रिश्ते हजार
कुछ दर्द के रिश्ते,कुछ प्यार के
फूल सा कोमल, कुछ चुभता शूल .
प्यार को समेट आँचल में तो
दर्द को भी भर दामन मेँ 
प्रेम का तू विस्तार कर।
निशा के परे ही दिवस है आता
पतझर के पास ही सदा मधुमास
मूक हो या मुखर ,दर्द सबका बराबर
विचार ,विवेचना तू मत कर
शूल पर फूल का खुशबू भर दे
प्रेम को तू विस्तृत कर ।संगीता ....

Thursday, December 31, 2015



लो, फिर आ गया एक नया साल ..
एक साल को बिदा दें ,एक से बिदा लें ।
आज है जो नया ,कल होगा वही पुराना
परिवर्तन के चक्र मे सब को है घूमना
कुछ भी नया नहीं , पर लगे नया
वही ,सूरज का उगना ,शाम की ढलना
तारों का खिलना,चंदा का इतराना
भवरों का फूल फूल पर मंडराना
चिड़ियों का बाग मे चहकना
पर महज एक तारीख का बदलना
भर दिया मन मे नयी उमंग, तरंग।
भेद है बस''भाव' का ,ओर कुछ नहीं ।
यही भाव से पूज लेते हैं प्रतिमा को ।
यही भाव से दूर रहते परिजनों के
पा लेते हैं अपनत्व स्नेहाशिश।
कुछ भी नया नहीं ,मेरे स्नेहिजन
पर ये रहा मेरी आप सब को
नया साल के अकूत अभिवादन(संगीता)

Tuesday, June 23, 2015

यात्रा

यात्रा
ये तन समष्टि पंचभूतों की 
ओर उसमे रहता ये चंचल मन
तन सदा गतिमान .
घूमता, इधर उधर 
न जाने किसे ओर क्यों ढूंढता है?
कभी पूरब तो कभी पश्चिम
कभी बीरान मे तन्हा सा
तो कभी भागती लोगों के
साथ बिलकुल अंजान सा ।
कभी धीमे कदम से चलना तो कभी
कभी आकाश का सीमा लांघता
पर यात्रा करते ही जाता..
मन-चंचल लहर सा
चपल शिशु सा ,
फुदकते गौरया सा
बावरा सा बस फिरते ही रहता
पर
ये तन ओर मन के परे .
एक यात्रा सतत चलता रहता है।
अंतर की यात्रा ......
नीरव,निर्बीकार
कोई ब्यवधान से अंजान
गहराई मे ज्ञान के ढूंढता.
सब को ले चलता ये जीवात्मा
कभी उलझता ,स्वयं ही सुलझता
सतत यात्रा उसकी चलता रहता ....संगीता.....30.11 .2014
महा संगीत`
पक्षी के हो कलरब
या मधुप का हो गुंजन,,
कल कल नाद हो निर्झर का 
या मंद मंद हो स्वर समीर का ,
पायल का हो झंकार या
थाप हो मृदंग या तबले की ,
अधर के कंपन से कंपित
हो मीठी मुरली की सुर ,
होते उत्पन्न टकराहट से
लगते मधुर या नाद निनाद .
इस से परे है एक नाद' अनहद'
होता ये मौन मे मुखर
सिर्फ शून्य,ओर शून्य
व्याप्त जड़ चेतन मे ,अन्तरिक्ष मे
ये गीत नहीं संगीत नहीं
ये है "महा संगीत शांति" की ।सांगीता.....

Thursday, April 23, 2015

साथी

साथी
नव निहालों को 
वर्ण बोध करती पुस्तक,
बीते समय को सहेज
इतिहास के रूप ले
हमे बताती
सभ्यता हुआ कैसे विकसित
गीता ,रामायण, बाइबल, कुरान
नाम अनेक ,पुस्तक अनेक
पुस्तक तुम सिखाती
धर्म एक - ब्रम्ह एक ।
यात्रा के साथी, एकांत के साथी
फुर्सत के साथी ,सुख दुख की साथी
तुम हो अति प्रिय साथी
इसीलिए घर घर हो मान पाती.।.(संगीता..... )

Wednesday, December 31, 2014

चलती पहिया समय की

मै समय हूँ  ,
बस निरंतर हूँ गतिमान 
परिवर्तन के 
शाश्वत नियम को कर 
उल्लंघन केबल मै 
सदा से अपरिवर्तित ।
मुझे बांध लो कितने 
दिन ,बार ,ऋतु ,साल मे 
नया या पुराना साल मान 
कर लो  कितना गान
मै सदा से अपरिवर्तित 
कित ने आए ,कितने गए 
कोई न मुझे समझ पाये 
ये महल ये शान ये आन ये बान 
यहीं रहा गया ।
नाम कुछ बहुत शीघ्र 
कुछ देर से 
पर मिट तो जाते हैं  .
समय के पहियों से 
आना ओर जाना यही है सत्य
न कोई साल पुराना 
न कोई साल नया 
मै हूँ समय - बस चलते ही रहना 
ओर बस चलते ही रहना.संगीता....

Monday, February 17, 2014

आमची मुंबई..











सागर में उठती लहरें, 
सड़कों पे भागती गाड़ियाँ,
पटरीयों में दौड़ते लोकल,
आसमान से बरसता पानी,
हमारी मुंबई आर्थिक राजधानी,
जागती मुंबई, भागती मुंबई
आपदा,विपदा में पल को रूकती,
 फिर सरपट भागती मुंबई

हर नए आगतों को डराती मुंबई,
 फिर बाँहों में भर लेती मुंबई,
 कोई भूखा रहता नहीं यहाँ,
क्यों की खाली बैठने देती नहीं मुंबई .(संगीता )

Thursday, September 26, 2013

परिवर्तित मानव

तन ओर उसमें मन 
रिश्तों के डोर हजार, 
खंड खंड मे बिभाजित मन 
अपेक्षाएँ सब के भिन्न ,भिन्न।
कब ओर कैसे ?
व्यक्तित्व हो जता परिवर्तित
मानव कब दानव बन जाता है 
पहचान खूद को नहीं पाता . 
ढलान ये कैसे !
उतार के बाद फिर ऊपर 
पहुँच नहीं पाता 
मानव को कौन  दानव बनाता .
क्या पाने निकलता है 
मानवता को ही खो रोता है 
साथ चलने को रिश्ते हजार
निभाने के लिए कोई नहीं तैयार 
आप की एक एक उपेक्षा के 
लेखा जोखा होता पल मे  तैयार 
मन बार बार पर गिरता,
फिर सम्ह्ल्ता
खंड खंड मे हर रिस्ता को निभाता 
फिर आता वो अशुभ पल 
मानव हो जाता दानव 
दया,करुणा,क्षमा ,सहनशीलता 
उस से जाता हो दूर 
नयन की तरलता हो जाता विलीन
तन तो मानव ही रहता
 मन दानव बन है जीता।संगीता............
  
    

Friday, September 20, 2013

क्षमा


पानी जैसे तरल क्षमा तुम
आओ मेरे मन को तरल कर दो 
मुझे सरल कर दो 
झूठा अहम से मुक्त हो
 क्षमा मांग लू,क्षमा करू
अवनि से अंबर कितना दूर
अमृत बिन्दु बन पावस 
उन्हे करीब लाती 
रूठे मन को मैं माना लूँ 
क्षमा दे सकू,क्षमा करूँ॰
सुगंध जैसे बिखर जाऊँ 
हर मन के कोना कोना 
क्षमा कर खुद महक जाऊ 
औरों को भी महकाऊँ
क्षमा दूँ ,क्षमा मांग लू 
सरल बनूँ,तरल बनूँ
शिशु सा निश्छल रहूँ
सांस का डोर जब टूटे 
तब मै पश्चाताप से मुक्त रहूँ ।
संगीता.........

Monday, August 26, 2013

विस्तारित प्रेम

स्नेह ,प्यार का रिश्ते हजारों 
कुछ दर्द के रिश्ते,कुछ प्यार के 
फूल सा कोमल, कुछ चुभता शूल . 
प्यार को समेट आँचल में तो 
दर्द को भी भर दामन मेँ 
प्रेम का तू विस्तार कर।

निशा के परे ही दिवस है आता
पतझर के पास ही सदा मधुमास
मूक हो या मुखर ,दर्द सबका बराबर 
विचार ,विवेचना तू मत कर
शूल पर फूल का खुशबू भर दे
प्रेम को तू विस्तृत कर दे ।संगीता ....