Sunday, September 4, 2016

स्नेह ,प्यार के रिश्ते हजार
कुछ दर्द के रिश्ते,कुछ प्यार के
फूल सा कोमल, कुछ चुभता शूल .
प्यार को समेट आँचल में तो
दर्द को भी भर दामन मेँ 
प्रेम का तू विस्तार कर।
निशा के परे ही दिवस है आता
पतझर के पास ही सदा मधुमास
मूक हो या मुखर ,दर्द सबका बराबर
विचार ,विवेचना तू मत कर
शूल पर फूल का खुशबू भर दे
प्रेम को तू विस्तृत कर ।संगीता ....

Thursday, December 31, 2015



लो, फिर आ गया एक नया साल ..
एक साल को बिदा दें ,एक से बिदा लें ।
आज है जो नया ,कल होगा वही पुराना
परिवर्तन के चक्र मे सब को है घूमना
कुछ भी नया नहीं , पर लगे नया
वही ,सूरज का उगना ,शाम की ढलना
तारों का खिलना,चंदा का इतराना
भवरों का फूल फूल पर मंडराना
चिड़ियों का बाग मे चहकना
पर महज एक तारीख का बदलना
भर दिया मन मे नयी उमंग, तरंग।
भेद है बस''भाव' का ,ओर कुछ नहीं ।
यही भाव से पूज लेते हैं प्रतिमा को ।
यही भाव से दूर रहते परिजनों के
पा लेते हैं अपनत्व स्नेहाशिश।
कुछ भी नया नहीं ,मेरे स्नेहिजन
पर ये रहा मेरी आप सब को
नया साल के अकूत अभिवादन(संगीता)

Tuesday, June 23, 2015

यात्रा

यात्रा
ये तन समष्टि पंचभूतों की 
ओर उसमे रहता ये चंचल मन
तन सदा गतिमान .
घूमता, इधर उधर 
न जाने किसे ओर क्यों ढूंढता है?
कभी पूरब तो कभी पश्चिम
कभी बीरान मे तन्हा सा
तो कभी भागती लोगों के
साथ बिलकुल अंजान सा ।
कभी धीमे कदम से चलना तो कभी
कभी आकाश का सीमा लांघता
पर यात्रा करते ही जाता..
मन-चंचल लहर सा
चपल शिशु सा ,
फुदकते गौरया सा
बावरा सा बस फिरते ही रहता
पर
ये तन ओर मन के परे .
एक यात्रा सतत चलता रहता है।
अंतर की यात्रा ......
नीरव,निर्बीकार
कोई ब्यवधान से अंजान
गहराई मे ज्ञान के ढूंढता.
सब को ले चलता ये जीवात्मा
कभी उलझता ,स्वयं ही सुलझता
सतत यात्रा उसकी चलता रहता ....संगीता.....30.11 .2014
महा संगीत`
पक्षी के हो कलरब
या मधुप का हो गुंजन,,
कल कल नाद हो निर्झर का 
या मंद मंद हो स्वर समीर का ,
पायल का हो झंकार या
थाप हो मृदंग या तबले की ,
अधर के कंपन से कंपित
हो मीठी मुरली की सुर ,
होते उत्पन्न टकराहट से
लगते मधुर या नाद निनाद .
इस से परे है एक नाद' अनहद'
होता ये मौन मे मुखर
सिर्फ शून्य,ओर शून्य
व्याप्त जड़ चेतन मे ,अन्तरिक्ष मे
ये गीत नहीं संगीत नहीं
ये है "महा संगीत शांति" की ।सांगीता.....

Thursday, April 23, 2015

साथी

साथी
नव निहालों को 
वर्ण बोध करती पुस्तक,
बीते समय को सहेज
इतिहास के रूप ले
हमे बताती
सभ्यता हुआ कैसे विकसित
गीता ,रामायण, बाइबल, कुरान
नाम अनेक ,पुस्तक अनेक
पुस्तक तुम सिखाती
धर्म एक - ब्रम्ह एक ।
यात्रा के साथी, एकांत के साथी
फुर्सत के साथी ,सुख दुख की साथी
तुम हो अति प्रिय साथी
इसीलिए घर घर हो मान पाती.।.(संगीता..... )