Wednesday, July 17, 2013

नित प्रातः इश के ध्यान करती हूँ
मोक्ष के चाहत भी रखती हूँ .
और कदम बढाती हूँ माया की ओर
काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह
के फेरे में हृदय को जख्मी करती हूँ
असत के दल दल में जा
जख्म पर मरहम लगाती हूँ .
पुरानी घाव के दाग सहलाती हूँ .
अपने को बहलाती हूँ .
ममता,प्रेम,करुणा बटोर
अपनों के बिच बाँट आती हूँ .
अपनों के मेले में
रहती बिलकुल अकेली मै.
पर सदा मै मुस्काती हूँ
माया में मै मायावी बन
माया से रिश्ता जोडती हूँ
मै मोक्ष के कामना करती हूँ
मै तो अपने को ही छलती हूं .(संगीता)

Thursday, July 4, 2013

सम्बन्ध

तोड़े कहाँ सम्बन्ध टूटता है
वह सदा अछूता रहता है
दोष दृष्टी के पार
अंतर्व्यथा का रूप ले
ह्रदय में पलता है.

कभी तुलिका में
अपने को परिभाषित करता
अभी गीतों में छंदों
स्व को मुखरित करता
सम्बन्ध कब तोड़े टूटता है

डगर मोड़ लो ,पथ बदल लो
बुद्धि से सौ लगाम कस लो
प्रहरी नियुक्त कर लो
मन से मन का लगाव
यूँ न छुटता है .

Tuesday, June 4, 2013

बिडम्बना


 बिडम्बना

उलझे उलझे सा ये रिश्ता ,
जितना मैं सुलझाते जाऊ
उतने ही उलझ जाऊ

कुछ रिश्ता सर्द सा दीखते हैं
पर बुझे राख में छुपे उष्मा सा
अपनापन दे जाते हैं .

कुछ रिश्ता पथराया सा
पाषण तले छुपे निर्झर सा
शीतलता दे जाते हैं।

बिखरा सा कोई रिश्ता
सरगम के सात सुरों में बंध
मन को झंकृत कर जाता .

समीपता में योजन की दूरता ,
दूरता में भी गूढ़ अंतरंगता
मिलना और बिछड़ना
दूर बहुत दूर अपनों से हो जाना
बीछोह के पीड़ा को व्यक्त न करना
पिघलते नयन नीर को
हिमखंड कर उर में सहेजना ...
बिदा लेना बहुत आसन तो नहीं .

ये कैसी बिडम्बना
अपनों को दुःख में घिरते देखना
चाहते हुए भवरों से न निकल पाना
बेबसी से मुंह फेर लेना
पत्थर ह्रदय को कर लेना '....
जीना बहुत आसन तो नहीं

विरोधाभास सब और
अंतर्मन मूक,तम से व्यथित
बाह्य चराचर मुखर आलोकित
सामंजस्य है कहीं नहीं
राह से रहगुजर का ......
आज कल में ढल समय बदलता ,
पर काल स्वयं कहाँ बदलता है ?

नदी का जल पल, पल बदलता
पर जल स्वयं कहाँ बदलता है ?

शैशव ,योवन ,जरा तन बदलता
पर आत्मा अजर कहाँ बदलता ?

परिवर्तन चक्र यूँ घूमता जाये ,
फिर परिवर्तन से क्यों विचलित

मौलिकता सदा से अपरिवर्तित
'परिवर्तन से यूं हो न व्यथित .(संगीता)
टूटे मन से
आगे बढ़ा नहीं जाता ,
पत्तों को सींच
पौधा बचाया नहीं जाता
बिन संबाद से
सुलह हो नहीं पाता
समस्या से दूर जा
समाधान हो नहीं सकता
जानते सब ,मानते सब
पर कान सीधे हाथ से
हर कोई पकड़ना नहीं चाह्ता ...........sangeeta....