Sunday, December 6, 2020

मांझी

उज्वल हो दिवा ,

या सुरमई साँझ

भरी दुपहरिया हो

या तारों भरी रात

खेते रहे मांझी नाव,

गाते रहे मल्हार

जीवन नैया चलती जाए


बांस के बांसुरी,

काठ के नाव

एक से उपजे सुर,

दूजा निर्वाह के उपाय.

सुर सजते जाए,

चलते जाए नाव.

पार उतारे जाने कितने मानुष.


थिरकन लहरों के,

धुन बांसुरी के

नश्वरता के पाठ

जगती को सिखाये

आज इस पार,

जाना है कल उस पार

अविरल बहते जाए समये के धार।

( संगीता-मीता)

Sunday, June 30, 2019

माटी

यहां माटी वहां माटी
कहाँ नहीं है माटी?
कहीं काली ,कहीं पीली 
बलुआ कहीं चिकनी
तरह,तरह की माटी,
कोई कहाँ मोल तेरे ?
बिखरी इधर उधर
अनमोल माटी..
माटी से फल, फसल
माटी से फूल ,फुलवारी
माटी से घर ,देह,देहरी
माटी से जीव ,जीवन ,क्यारी
करे माटी कुम्हार की चाकरी ।
माटी से सब जग निर्मित
न बना सका कोई माटी ,
सबकुछ माटी में मिट जाता
माटी ठगा माटी का आदमी ।
 *संगीता* 'मीता'

Sunday, September 4, 2016

तुम परम आनंद ,सत चिद आनंद 
मै आनंद के प्रथम छंद 
फिर ये विषाद कैसे है व्याप्त ?
तुम पवित्रता के महासिंधु तो 
मै पवित्रतम बिंदु ,फिर 
पातकता कैसे आविर्भूत ?
तुम सुमेरु निर्गुण ,सगुणों की
मै रेनू उसी सुमेरु की
फिर तुम में ,मुझमें भेद कैसा ?
तुम विद्या के सम्पूर्ण घट तो
मैं हूँ क्षुद्र वर्ण ,लिपि फिर
ये अविद्या मुझे कैसे करे लिप्त ?
तुमसे ही प्रस्फुटित ,पल्लवित
मिथ्या से मै क्यों सिंचित ?
विरोधाभास से मैं क्यों ग्रसित ?
स्वरुप अपने कर दो प्रकट
सम्हाल लो प्रभू अब तो मुझे
हो जाऊं तुम में समाहित sangeeta
स्नेह ,प्यार के रिश्ते हजार
कुछ दर्द के रिश्ते,कुछ प्यार के
फूल सा कोमल, कुछ चुभता शूल .
प्यार को समेट आँचल में तो
दर्द को भी भर दामन मेँ 
प्रेम का तू विस्तार कर।
निशा के परे ही दिवस है आता
पतझर के पास ही सदा मधुमास
मूक हो या मुखर ,दर्द सबका बराबर
विचार ,विवेचना तू मत कर
शूल पर फूल का खुशबू भर दे
प्रेम को तू विस्तृत कर ।संगीता ....